जब बचपन से एक दूजे का थे सहारा
तो अकेले छोड़ जाना क्यों था गवारा
हुआ जब दुख मुझे तब जान तुम लेते
हर ठेस तेरी पर घाव मेरे दिल पे होते
पर न जाने क्यों इन दिनों खुद मे ही थी इतनी त्रस्त
की जान न पाई तुम अलविदा कहने मे थे व्यस्त
ले ही जाना था ए खुदा तो ले जाते
पर मुझ से यह गुनाह न करवाते
तू जाता ये न थी तेरी मर्जी
मजाल उस भगवान की जो उठा लेता तुझे
जब तक मेरा मन न हुआ राजी
